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Tuesday, September 14, 2021

चन्द्रशेखराष्टकम


 चन्द्रशेखराष्टकम


चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्   

रत्नसानुशरासनं  रजतादृश्रृंग निकेतनं
 सिंजिनीकृत्पन्नगेश्वर मच्युताननसायकम्क्षि
प्रदग्धपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवंदितं
 चंद्रशेखरमाश्रये  मम किं करिष्यति वै यमः 

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम् 

पञ्चपादपपुष्पगंधपदांबुजद्वयशोभितं
भाललोचन जातपावक दग्धमन्मथ विग्रहम् 
भस्मदिग्धकलेबरं  भव नाशनं  भवमव्ययं
चंद्रशेखरमाश्रये  मम किं करिष्यति वै यमः 

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

 मत्तवारण मुख्यचर्म कृतोत्तरीय मनोहरनं
 पंकजा सन पद्मलोचन पूजीतां घृसरोरुहम् 
देविसिंधुतरंगसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चंद्रशेखरमाश्रये  मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

यक्ष राज सखं भगाक्षहरं  भुजंग विभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम् 
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारि मृगधारिनं
चंद्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

कुण्डलीकृत कुण्डलेश्वर कुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेरम्
अंधकांतकमाश्रितामरपदापं शमनान्तकं
चंद्रशेखरमाश्रये  मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

भेषजं भवारोगिना मखिला पदाम पहारिनम्
दक्षयज्ञ विनाशनं  त्रिगुणात्मकं  त्रिविलोचनम्  
भुक्तिमुक्ति फलप्रदं सकलाघसंघ निबरहनं
चंद्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

भक्तवत्सलमर्चितं  निधिक्षयं हरिदंबरम
सर्वभूतपतिं  परात्परमप्रमेयनुत्तमम्  
सोमवारिद भूहुताशन  सोमपानिलखाकृतिं
चंद्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

विश्वसृष्टिविधायिनं  पुनरेव  पालन तत्परं
संहरंतमपि  प्रपञ्चमशेष लोकनिवासिनम्  
कीडयंत  महार्निशं  गणनाथयूथसमन्वितन
चंद्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

मृत्युभीतमृकंडुसुनुकृत स्तवंशिवसन्निधौ
 यत्र  कुत्र  च  यः  पढ़ेन्न हि  तस्य मृत्युभयं भवेत् 
पूर्णमायुररोग  तामखि लार्थ संपद मादरात् 
 चंद्रशेखर एव तस्य ददाति  मुक्तिमयत्नतः

चन्द्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर पहिमाम् 
चंद्रशेखर चंद्रशेखर चंद्रशेखर रक्षमाम्  

 


Thursday, October 18, 2018

आरती शंकर जी की




"आरती शंकर जी की "

आरती करो हर हर की करो नटवर की भोले शंकर की, आरती करो शंकर की 

सिर पर शशि का मुकुट सवाँरे, तारों के पायल झनकारे
धरती अम्बर डोले तांडव, लीला की नटवर की, आरती करो शंकर की

फण का हार पहनने वाले, शम्भो हैं जग के रखवाले
सकल चरा चर वो डमरू धर, ऊँगली पर विष धर की, आरती करो शंकर की 

महा देव जय जय शिव शंकर, जय गंगा धर जय डमरू धर, 


हे देवों के देव मिटायो, विपदा अब घर घर की, आरती करो शंकर की 


शिवदानी तू नजा नजा



शिव दानी तू नजा नजा, मन में तू बस जा
हर हर बम बम शब्द सुना, डिम डिम डमरू बजाबजा 
शिव दानी तू नजा नजा .....................

नित्य भोर बेलपत्र चढाऊं, भांग धथुर खोजि लाऊँ
जैसे मानो वैसे मनाऊं, हर हर भोले नजा 
शिव दानी तू नजा नजा......................

करुणाकर करुणा बरसाऊँ, अमृता पान करा
नित्य रामचंद्र चन्दन लगावे , तू क्यों भस्म लगा 
शिव दानी तू नजा नजा .......................



ज्योतिर्लिङ्गानि



सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकाल मोंकारममलेश्वरम ।।
परल्यां बैध्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम ।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ।।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे ।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।।
एतानि ज्यितिर्लिंगानी सायं प्रातः पठेन्नरः ।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।

Wednesday, February 28, 2018

शम्भु स्तुति (शिव स्तोत्र)


shambhu-stuti


नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥१॥

नमामि देवं परमव्ययंतं उमापतिं लोकगुरुं नमामि ।
नमामि दारिद्रविदारणं तं नमामि रोगापहरं नमामि ॥२॥

नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं नमामि विश्वोद्ध्वबीजरूपम् ।
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥३॥

नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यं क्षरमक्षरं तम् ।
नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥४॥

नमामि कारुण्यकरं भवस्या भयंकरं वापि सदा नमामि ।
नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥५॥

नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् ।
नमामि पुण्यं सदसद्व्यतीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥६॥

नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रूपाणि बहूनि धत्ते ।
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥७॥

 यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः ।
आराधितो यश्च ददाति सर्वं नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥८॥

नमामि सोमेश्वरंस्वतन्त्रं उमापतिं तं विजयं नमामि ।
नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥९॥

नमामि देवं भवदुःखशोकविनाशनं चन्द्रधरं नमामि ।
नमामि गंगाधरमीशमीड्यम् उमाधवं देववरं नमामि ॥१०॥

नमाम्यजादीशपुरन्दरादिसुरासुरैरर्चितपादपद्मम ।
नमामि देवीमुखवादनाना मिक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत ॥११॥

पंचामृतैर्गन्धसुधूपदीपैर्विचित्रपुष्पैर्­विविधैश्च मन्त्रैः ।
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥१२॥

Saturday, February 24, 2018

लिंगाष्टकम



ब्रह्ममुरारी सुरार्चित लिंगम निर्मल भाषित शोभित लिंगम ।
जन्मजदुःख विनाशक लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

देवमुनिप्रवरार्चित लिंगम कामदहन करुणाकर लिंगम ।
रावणदर्प विनाशन लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

सर्वसुगंधि सुलेपित लिंगम बुद्धिविवर्धन कारण लिंगम ।
सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

कनक महामणिभूषित लिंगम फणिपतिवेष्टित शोभित लिंगम ।
दक्षसुयज्ञ विनाशन लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

कुंकुमचन्दन लेपित लिंगम पंकजहार सुशोभित लिंगम ।
सञ्चितपाप विनाशन लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

देवगणारचित सेवित लिंगम भावैरभक्तिभिरेव च लिंगम ।
दिनकर कोटिप्रभाकर लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

अष्टदलोपरि वेष्टित लिंगम सर्वसमुद्भवकारण लिंगम ।
अष्टदरिद्रविनाशित लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।

सुरगुरुसुरवर पूजित लिंगम सुरवनपुष्प सदार्चित लिंगम ।
परात्परंपरमात्मक लिंगम तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।। 

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पढेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।

Friday, February 23, 2018

शिवतांडव स्तोत्र (शिव स्तोत्र )



जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||१||

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि |
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ||२||

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||३||

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ||४||

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ||५||

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ||६||

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ||७||

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ||८||

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ||९||

अखर्व(अगर्व) सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ||१०||

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम ||१२||

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ||१४||

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः||१५||

Thursday, February 22, 2018

शिवदानी तू न जा न जा

 

शिवदानी तु न जा न जा, मन में तु बस जा 
हरहर बमबम शब्द सुना, डिमडिम डमरू बजा बजा
शिवदानी तु न जा न जा..…..........

नित्य भोर बेलपत्र चढ़ाऊँ भांग धथुर खोजि लाऊं
जैसे मानो वैसे मनाऊं हर हर भोले न जा
शिवदानी तु न जा न जा............

करुणाकर करुणा बरसाओ अमृत पान करा
नित्य रामचंद्र तिलक लगावें तु क्यों भस्म लगा
शिवदानी तु न जा न जा...........

Sunday, October 6, 2013

आजु नाथ एक व्रत (महेशवाणी आ नचारी,विद्यापति पद )


आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे। ।
तोहे गौरी कहैछह नाचय हमें कोना नाचब हे।।
चारि सोच मोहि होए कोन बिधि बाँचब हे।।
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे।।
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे।।
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे ।।
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे।।
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे।।
होएत सहस मुखी धार समेटलो नही जाएत हे।।
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे।।
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे।।
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे।।
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे।



अर्थ :
उपरोक्त पदों में गौरी के माध्यम से कवि कोकिल विद्यापति कहते हैं कि हे शिव ! आज एक महान व्रत का मुहूर्त है और मुझे सुख का अनुभव हो रहा है। हे प्रभु आप नटराज का भेष धारण कर डमरू बजावें। गौरी के इस आग्रह को सुन शिव जी कहते हैं ...हे गौरी आप हमें नाचने के लिए कह रही हैं पर मैं कैसे नाचूं ? कारण, नृत्य से उत्पन्न संभावित चार खतरों से मैं चिंतित हूँ जिससे बचना मुश्किल है। पहला - नृत्य के क्रम में चाँद से अमृत की बूँदें टपकेंगी जिससे मेरा यह बाघम्बर सजीव अर्थात जीवित हो जायेगा और मेरे बसहा को खा जायेगा। दूसरा - नृत्य के क्रम में ही मेरे जटा जूट में लिपटे हुए सांप नीचे की तरफ खिसक कर आ जाएँगे और और पृथ्वी पर विचरण करने लगेंगे, जिसके फलस्वरूप कार्तिक के पाले हुए मयूर उन्हें मार डालेंगे । तीसरा - जटा से निकलकर गंगा भी बाहर आ जाएँगी और सहस्त्र मुखी हो बहने लगेंगी, जिसे संभालना बहुत मुश्किल होगा । चौथा - मुंड का माला भी टूट कर बिखर जाएगा और वे सारे जीवित हो उठेंगे और आप यहाँ से भाग जाएँगी । यदि आप ही भाग जाएँगी तो फिर नृत्य का क्या प्रयोजन , कौन देखेगा ? इस गीत को गाकर विद्यापति कहते हैं औघर दानी शंकर पार्वती के मान की रक्षा करते हुए नृत्य भी करते हैं और संभावित खतरा से भी बचा लिया

Saturday, January 7, 2012

शंकरं संप्रदम (तुलसीदास स्तोत्र )


"शिव स्तोत्र"

शंकरं, सम्प्रदम, सज्जनानंददं , शैल-कन्या-वरं, परमरम्यं 
काम-मद-मोचनं, तामरस-लोचनं, वामदेवं, भजे भावगम्यं 
कंबु-कुंदेंदु-कर्पूर-गौरं  शिवं, सुंदरं, सच्चिदानंदकंदं  
सिद्ध-सनकादि-योगीन्द्र-वृन्दारका, विष्णु-विधि-वंद्ध चरणारविंदं 
ब्रह्म-कुल -वल्लभं, सुलभ मति दुर्लभं, विकट-वेषं, विभुं, वेदपारं 
नौमि करुणाकरं, गरल-गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं , निर्विकारं 
लोकनाथन शोक-शूल-निर्मूलिनं, शूलिनं मोह -तम-भूरि-भानुं 
कालकालं, कालातीतमजरं, हरं, कठिन-कलिकाल-कानन क्रिशानुं 
तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं  
प्रचुर-भव-भंजनं, प्रणत-जन-रंजनं, दास तुलसी शरण सानुकूलं 

-गोस्वामी तुलसीदास-


Friday, February 25, 2011

शम्भु शंकर तेरी महिमा


"अब दर्शन दे दो हे महेश्वर"

शंकर शम्भो तेरी महिमा, 
सुमिरत निश दिन ध्यान लगावें
ध्यान लगावे शिवपुर पावें
बम बम बम बम बम बम बम

बीच भ्रमर में नाव डूबत है 
पार लगा दो हे प्रलयंकर  
तीनो लोक चरण में तेरे 
शरण में आई हे परमेश्वर 

रूद्र रूप हो सर्वसंघारी
नतमस्तक हूँ हे चंद्रशेखर     
आस लगाए बैठी कब से 
अब दर्शन दे दो हे महेश्वर

-कुसुम ठाकुर-


Wednesday, February 2, 2011

देवाधि देव शंकर !


"देवाधि देव शंकर"

देवाधि देव शंकर, कर में  त्रिशूल धारी,
आ जाओ हे मृत्युंजय, भव पाप नाश हारी।  

गले रूद्र माल साजय शशि भाल पै विराजे, 
भव पाप नाशिनी माँ, गंगे है सर पे गाजे।  

त्रय लोक के हो स्वामी तन पे भुजंग धारी,
आ जाओ हे मृत्युंजय भव पाप नाश हारी। 
देवाधि देव शंकर .............................। 

Friday, May 21, 2010

श्री शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम

"श्री शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम"

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय 
भस्मांगरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय 
तस्मै न काराय नमः शिवाय ।।

मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नंदीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मंदारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय 
तस्मै म काराय नमः शिवाय । ।

शिवाय गौरी बदनब्ज वृन्द-
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्री नीलकंठाय वृषध्वजाय 
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ।।

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चंद्रार्क   वैश्वानरलोचनाय
तस्मै  व काराय नमः शिवाय ।।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय 
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय 
तस्मै य काराय नमः शिवाय ।।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधो ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।

Sunday, August 9, 2009

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय ( पंचाक्षर )


त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम
उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ।


कहते हैं शिव जी अर्थात भोला बाबा या भोले दानी बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें यदि प्रतिदिन जल चढाई जाय तो वो उससे भी प्रसन्न रहते है। वैसे तो लोगों का अलग अलग मत है पर यदि भोला बाबा को मन से अपने अपने घरों में भी याद की जाय तो वे अपने भक्तों को निराश नहीं करते। 




(1 )
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्मंगरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुध्याय दिगम्बराय
तस्मै न काराय नमः शिवाय ।।
मंदा किनी सलिल चन्दन चर्चिताय
नन्दीश्वर प्रमथ नाथ महेश्वराय।
मंदार पुष्प बहु पुष्प सुपूजिताय
तस्मै म काराय नमः शिवाय ।।
शिवाय गौरी बदनाब्जवृन्द
सूर्याय दक्षा ध्वरनाशकाय।
श्री नील कंठाय वृषध्वजाय
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ।।
वसिष्ठ कुम्भो द्भव गौतमार्य-
मुनीन्द्र देवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्क वैश्वा नरलोचलाय
तस्मै व काराय नमः शिवाय।।
यक्षस्व रूपाय जटाधराय
पिनाक हस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै य काराय नमः शिवाय ।।
पंचाक्षर मिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिव लोक म़वा प्नोति शिवेन सः मोदते।।

 
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