Showing posts with label विद्यापति के पद. Show all posts
Showing posts with label विद्यापति के पद. Show all posts
Wednesday, February 8, 2017
Thursday, October 10, 2013
हम नहि आजु रहब अहि आँगन (विद्यापति के पद )
जं बुढ होइत जमाय, गे माई।
एक त बैरी भेल बिध बिधाता
दोसर धिया केर बाप।
तेसरे बैरी भेल नारद बाभन ।
जे बुढ अनल जमाय। गे माइ ।।
पहिलुक बाजन डामरू तोड़ब
दोसर तोड़ब रुण्डमाल ।
बड़द हाँकि बरिआत बैलायब
धियालय जायब पराय गे माइ । ।
धोती लोटा पतरा पोथी
सेहो सब लेबनि छिनाय।
जँ किछु बजताह नारद बाभन
दाढ़ी धय घिसियाब, गे माइ। ।
भनइ विद्यापति सुनु हे मनाइनि
दृढ करू अपन गेआन ।
सुभ सुभ कय सिरी गौरी बियाहु
गौरी हर एक समान, गे माइ।।
Tuesday, March 1, 2011
गौरा तोर अंगना ( विद्यापति पद )
फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को महा शिव रात्रि मनाया जाता है. इस दिन देवाधि देव शिव शंकर का माँ गौरी से विवाह हुआ था. अतः शिव विवाह के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व है. जिसे हर क्षेत्र के लोग बड़े ही श्रद्धा से मनाते हैं. कहते हैं भोले नाथ बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं अतः लोग इस दिन व्रत रख भोले नाथ की प्रिय वस्तु भांग धतुरा और बेल पत्र चढ़ा पूजा अर्चना करते हैं.
विद्यापति की भक्ति से प्रसन्न हो साक्षात भोले नाथ उनकी चाकरी करने उनके पास आ गए थे. शिवरात्रि के अवसर पर विद्यापति का यह गीत:
"गौरा तोर अंगना"
गौरा तोर अंगना,बर अजगुत देखल तोर अंगना।
एक दिस बाघ सिंह करे हुलना ।
दोसर बरद छैन्ह सेहो बओना।।
हे गौरा तोर ................... ।
कार्तिक गणपति दुई चेंगना।
एक चढथि मोर एक मुस लदना ।।
हे गौर तोर ............ ।
पैंच उधार मांगए गेलहुँ अंगना ।
सम्पति देखल एक भाँग घोटना ।।
हे गौरा तोर ................ ।
खेती न पथारी शिव गुजर कोना ।
जगतक दानी थिकाह तीन-भुवना।।
हे गौरा तोर ............... ।
भनहि विद्यापति सुनु उगना ।
दरिद्र हरन करू धएल सरना ।।
"कवि कोकिल विद्यापति"
इन पंक्तियों में विद्यापति कहते हैं : हे गौरी ! आपके आंगन में अजीब बात देखा. एक तरफ बाघ, सिंह हुलक रहे थे, दूसरी तरफ एक बौना बैल भी था. कार्तिक और गणपति नाम के दो बच्चों को भी देखा. एक मयूर पर चढ़ा हुआ तो दूसरा मूस यानि चूहे पर लदा हुआ था. उधार माँगने के उदेश्य से गया था, मगर संपत्ति के नाम पर मात्र भांग घोटना (भांग घोटने वाला ) दिखा. शिव खेती नहीं करते बस भांग में मस्त रहते हैं. सच, वह तो दानी हैं, संसार के तीनो भुवन. विद्यापति कहते हैं - हे शिव ! मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरा दारिद्र हरण करें.
Thursday, February 3, 2011
माधव कत तोर करब बड़ाई.
"कवि कोकिल विद्यापति"
माधव कत तोर करब बड़ाई
उपमा तोहर कहब ककरा हम, कहितहुं अधिक लजाई
जओं सिरिखंड सौरभ अति दुर्लभ, तओं पुनि काठ कठोरे
जओं जगदीस निसाकर, तओं पुनि एकहि पच्छ इजोरे
मनिक समान आन नहि दोसर, तनिक पाथर नामे
कनक सरिस एक तोहिं माधव, मन होइछ अनुमाने
सज्जन जन सओं नेह कठिन थिक, कवि विद्यापति भाने
उपरोक्त पक्तियों में कवि विद्यापति कहते हैं .....हे श्री कृष्ण मैं आपका गुणगान कैसे करूँ, आपकी तुलना किससे करूँ. मुझे तो तुलना करने में भी संकोच हो रहा है . यदि आपकी तुलना दुर्लभ श्री खंड से करता हूँ तो दूसरी तरफ वह कठोर भी तो है. यदि आपकी तुलना दुनिया को रोशनी से उजाला करने वाले चन्द्रमा से करता हूँ तो वह भी तो मात्र एक ही पक्ष के लिए होता है. मणि-माणिक्य से दामी एवम सुन्दर दूसरा कुछ नहीं होता, पर आखिर है तो पत्थर ही. उससे आपकी तुलना कैसे करूँ ? सोना के समान दमकते हुए केला से भी आपकी तुलना नहीं की जा सकती वह भी आपके आगे बहुत छोटा पड़ जाता है. मेरा अनुमान बिल्कुल सही है आपके समान दूसरा कोई नहीं है. कवि विद्यापति कहते हैं सज्जन अर्थात महान व्यक्ति से नेह जोड़ना बहुत ही कठिन है.
Saturday, December 11, 2010
अभिनव पल्लव
"कवि कोकिल विद्यापति"
अभिनव पल्लव बैसक देल
धवल कमल फुल पुरहर भेल
करू मकरंद मंदाकिनि पानी
अरुन असोग दीप दहु आनि
माई हे, आज दिवस पुनमंत
करिअ चूमाओन राय बसंत
संपून सुधानिधि दधि भल भेल
बहामी बहामी भमर हकारय गेल
केसु कुसुम सिंदूर सम भास्
केतकि धूलि बिथरहु पटबास
भनइ विद्यापति कवि कंठहार
रस बुझ सिवसिंह सिव अवतार
उपरोक्त पंक्तियों में कवि विद्यापति बसंत ऋतु का स्वागत करते हुए कहते हैं कि : नए पल्लव को आसन के रूप में रखा गया है तथा श्वेत कमल को कलश के रूप में . पुष्प रस (मकरंद) गंगाजल और अशोक के नए लाल कोमल पत्ते को दीप के रूप में सजा दिया गया है. वे कहते हैं हे, दाई माई आओ इस शुभ दिन में राजा बसंत का चुमावन की जाए. पूनम का चाँद दही का कम कर रहा है. भंवरा घूम घूम कर सबको हकार (निमंत्रण) दे रहा है. पलास (टेसू ) का फूल सिंदूर जैसा लग रहा है. केतकी (केवडा) का पराग सुगन्धित चूर्ण के रूप में प्रयोग हो रहा है . कवि कंठहार कहते हैं कि इसका रस शिव अवतार राजा शिव सिंह समझते हैं.
Saturday, October 2, 2010
रूसी चलली भवानी (महेशवाणी आ नचारी)

"कवि कोलिक विद्यापति"
रुसि चलली भवानी तेजि महेस
कर धय कार्तिक कोर गनेस
तोहे गउरी जनु नैहर जाह
त्रिशुल बघम्बर बेचि बरु खाह
त्रिशुल बघम्बर रहओ बरपाय
हमे दुःख काटब नैहर जाए
देखि अयलहुं गउरी, नैहर तोर
सब कां पहिरन बाकल डोर
जनु उकटी सिव , नैहर मोर
नाँगट सओं भल बाकल-डोर
भनइ विद्यापति सुनिअ महेस
नीलकंठ भए हरिअ कलेश
उपरोक्त पंक्तियों में कवि कोकिल विद्यापति गौरी के रूठ कर जाने का वर्णन करते हुए कहते हैं :
गौरी रूठ कर शिव जी को छोड़ विदा होती हैं. कार्तिक का वे हाथ पकड़ लेती हैं और गणेश को गोद में ले लेती हैं . शिव जी आग्रह करते हुए कहते हैं - हे गौरी , आप नैहर (मायके ) न जाएँ . चाहे उन्हें त्रिशूल और बाघम्बर बेचकर ही क्यों न खाना पड़े . यह सुन गौरी कहती हैं - यह त्रिशूल और बाघम्बर आपके पास ही रहे . मैं तो नैहर जाऊँगी ही , चाहे दुःख ही क्यों न काटना पड़े . तब शिव जी कहते हैं - हे गौरी मैं आपका नैहर भी देख आया हूँ . वहाँ लोग क्या पहनते हैं ....सभी बल्कल यानि पेड़ का छाल आदि पहनते हैं . यह सुन गौरी गुस्सा जाती हैं और कहती हैं - हे शिव मेरे नैहर को मत उकटिए( शिकायत ) . ऐसे नंगा रहने से तो अच्छा है लोग पेड़ का छाल तो पहनते हैं . विद्यापति कहते हैं - हे शिव , सुनिए ! नीलकंठ बन जाएँ और गौरी के सारे क्लेश का हरण कर लें .
Friday, October 1, 2010
आजु नाथ एक व्रत (महेशवाणी आ नचारी)
कवि कोकिल विद्यापति
"आजु नाथ एक व्रत "
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे। ।
तोहे गौरी कहैछह नाचय हमें कोना नाचब हे।।
चारि सोच मोहि होए कोन बिधि बाँचब हे।।
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे।।
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे।।
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे ।।
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे।।
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे।।
होएत सहस मुखी धार समेटलो नही जाएत हे।।
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे।।
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे।।
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे।।
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे। ।
तोहे गौरी कहैछह नाचय हमें कोना नाचब हे।।
चारि सोच मोहि होए कोन बिधि बाँचब हे।।
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे।।
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे।।
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे ।।
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे।।
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे।।
होएत सहस मुखी धार समेटलो नही जाएत हे।।
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे।।
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे।।
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे।।
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे।
अर्थ :
उपरोक्त पदों में गौरी के माध्यम से कवि कोकिल विद्यापति कहते हैं कि हे शिव ! आज एक महान व्रत का मुहूर्त है और मुझे सुख का अनुभव हो रहा है। हे प्रभु आप नटराज का भेष धारण कर डमरू बजावें। गौरी के इस आग्रह को सुन शिव जी कहते हैं ...हे गौरी आप हमें नाचने के लिए कह रही हैं पर मैं कैसे नाचूं ? कारण, नृत्य से उत्पन्न संभावित चार खतरों से मैं चिंतित हूँ जिससे बचना मुश्किल है। पहला - नृत्य के क्रम में चाँद से अमृत की बूँदें टपकेंगी जिससे मेरा यह बाघम्बर सजीव अर्थात जीवित हो जायेगा और मेरे बसहा को खा जायेगा। दूसरा - नृत्य के क्रम में ही मेरे जटा जूट में लिपटे हुए सांप नीचे की तरफ खिसक कर आ जाएँगे और और पृथ्वी पर विचरण करने लगेंगे, जिसके फलस्वरूप कार्तिक के पाले हुए मयूर उन्हें मार डालेंगे । तीसरा - जटा से निकलकर गंगा भी बाहर आ जाएँगी और सहस्त्र मुखी हो बहने लगेंगी, जिसे संभालना बहुत मुश्किल होगा । चौथा - मुंड का माला भी टूट कर बिखर जाएगा और वे सारे जीवित हो उठेंगे और आप यहाँ से भाग जाएँगी । यदि आप ही भाग जाएँगी तो फिर नृत्य का क्या प्रयोजन , कौन देखेगा ? इस गीत को गाकर विद्यापति कहते हैं औघर दानी शंकर पार्वती के मान की रक्षा करते हुए नृत्य भी करते हैं और संभावित खतरा से भी बचा लिया।
Friday, February 12, 2010
कखन हरब दुःख मोर (महेशवाणी आ नचारी)

मिथिला में शिव आ शक्ति केर पूजा होइत छैक। कोनो पाबनि हो बियाह हो कि उपनयन, बिना भोला बाबा आ भगवती के गीत के ओ संपन्न नहि भs सकैत छैक। मोन भेल, जे सब net प्रयोग करैत छथि हुनका लोकनि के लेल किछु भगवतीक गीत, महेशवाणी आ नचारीक संग्रह एकहि ठाम रहे तs हुनका लोकनि के सुविधा भs जयतैन्ह।
महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रस्तुत अछि किछु महेशवाणी आ नचारी ।
महेशवाणी आ नचारी
(१)
कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ।
दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल
सुख सपनहु नहि भेल हे भोला ।
एहि भव सागर थाह कतहु नहि
भैरव धरु करुआर ;हे भोलानाथ ।
भन विद्यापति मोर भोलानाथ गति
देहु अभय बर मोहि, हे भोलानाथ।
Wednesday, August 12, 2009
गौरा तोर अंगना (महेशवाणी आ नचारी)

कवि कोकिल विद्यापति
गौरा तोर अंगना।
बर अजगुत देखल तोर अंगना।
एक दिस बाघ सिंह करे हुलना ।
दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना।।
हे गौरा तोर ................... ।
कार्तिक गणपति दुई चेंगना।
एक चढथि मोर एक मुसना।।
हे गौर तोर ............ ।
पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना ।
सम्पति मध्य देखल भांग घोटना ।।
हे गौरा तोर ................ ।
खेती न पथारि शिव गुजर कोना ।
मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना ।।
हे गौरा तोर ............... ।
भनहि विद्यापति सुनु उगना ।
दरिद्र हरन करू धएल सरना ।।
Thursday, February 12, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)





