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Monday, October 22, 2018

भद्र काली हमर कष्ट जल्दी हरु


भद्र काली हमर कष्ट जल्दी हरु
पुत्र हमहु अहाँ के पड़ल छी गरु

पाठ पूजा नहि जानि कोना हम करू
चित्त चंचल सदा ध्यान कोना धरु 
भद्र काली ............................

अम्बे हरदम अहिं के जपब हम बरु 
आस माता हमर शीघ्र पूरन करू
भद्र काली .............................

दिय दर्शन सदा निज भक्तन के बरु 
दीन बच्चाके आशा के पूरण करू
भद्र काली .............................




Wednesday, October 17, 2018

भगवति गीत (हे जननी अहाँ जन्म सुफल करु)

हे जननि अहाँ जन्म सुफल कर 

हे जननि अहाँ जन्म सुफल करु पूजा करबहु हे अम्बे
हे जननि अहाँ जन्म सुफल करु पूजा करबहु हे अम्बे

त्रिभुवन तारिणीशत्रु संहारिणी तीन भुवन में हे अम्बे
हे जननि अहाँ ..................................................

यशोदा नंदन कंस निकंदन त्रिभुवन भंजननि हे अम्बे
हे जननी अहाँ ..................................................

लाल ध्वज पर कमल विराजे माया दृष्टि देहु हे अम्बे
हे जननि अहाँ ................................................

Tuesday, October 16, 2018

भगवती गीत (सिंह पर एक कमल राजित )

सिंह पर एक कमल राजित 

सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती 
उदित दिनकर लाल छवि निज रूप सुन्दर छाजति 
सिंह पर एक कमल .......................................
शंख गहि-गहि चक्र गहि-गहि लोक के माँ पालती 
दांत खट-खट जिह लह-लह शोणित दांत गढ़ावति
सिंह पर एक कमल .......................................
शोणित टप-टप पिबति जोगिनी विकट रूप देखावति
ब्रह्मा अयलनि विष्णु अयलनि शिवजी अयलनि एहि गति 
सिंह पर एक कमल .........................................

Thursday, September 29, 2016

सरस्वती वंदना



माँ शारदे कहाँ तू वीणा बजा रही है, 
किस मंजू गान से तू जग को लुभा रही है।

किस भाव में भवानी तू मगन हो रही है, 
विनती नहीं हमारी माँ क्यों तू सुन रही है।

हम दिन बाल कब से विनती सुना रहे हैं,
चरणों में तेरी माता हम सिर झुक रहे हैं।

अज्ञानता है हम में वो शीघ्र दूर कर दे,
द्रुत ज्ञानता का हममे माँ शारदे तू भर दे।

बालक सभी जगत के सूत मातु हैं तुम्हारे
 प्राणों से प्रिय हैं हम पुत्र सब दुलारे।

हमको दयामई तू ले गोद में बिठा ले, 
अमृत जगत में हमको माँ ज्ञान का पिला दे।

मातेश्वरी तू सूत की सुनले विनय हमारी
 करके दया तू हरले बाधा जगत समर की।


Saturday, October 5, 2013

भगवती गीत (माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी )


माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,
अब जाऊँ किधर तज शरण तुम्हारी 

दर भी तुम्हारा लगे मुझको प्यारा,
 तजूँ मैं कैसे अब शरण तुम्हारी 
माँ .........................................

मन मेरा चंचल, धरूँ ध्यान कैसे,
बसो मेरे मन, मैं शरण तुम्हारी
माँ..........................................

जीवन की नैया मझधार में है, 
पार उतारो मैं शरण तुम्हारी
माँ .................................... 

तन में न शक्ति, करूँ मन भक्ति 
अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी 
माँ.............................................

- कुसुम ठाकुर - 

Sunday, October 16, 2011

भगवती गीत (भय हरण कालिका )


"भय हरण कालिका"

जय जय जग जननि देवी
सुर नर मुनि असुर सेवी
भुक्ति मुक्ति दायिनी भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी।

मुंडमाल तिलक भाल 
शोणित मुख लगे विशाल 
श्याम वर्ण शोभित, भय हरण कालिका।
जय जय जग जननि देवी ।

हर लो तुम सारे क्लेश 
मांगूं नित कह अशेष 
आयी शरणों में तेरी, भय हरण कालिका ।
जय जय जग जननि देवी ।

माँ मैं तो गई हूँ हारी 
 माँगूं कबसे विचारी 
करो अब तो उद्धार तुम, भय हरण कालिका ।  
जय जय जग जननि देवी ।

-कुसुम ठाकुर-


Saturday, January 22, 2011

विद्यापति गीत ( कनक भूधर )


"कवि कोकिल विद्यापति"

(कवि कोकिल विद्यापति मिथिला के घर घर में अब भी अपनी रचनाओं के माध्यम से बसे हैं . ऐसा कोई भी शुभ कार्य  नहीं जहाँ विद्यापति की रचनाओं को ना गाया जाता हो . शुभ कार्यों में भगवती या देवी स्तुति तो आवश्यक है . मिथिला वासी शिव शक्ति की पूजा करते हैं  और हर शुभ  कार्य का प्रारंभ देवी की स्तुति से होता है . प्रस्तुत है विद्यापति रचित देवी स्तुति . )
"कनक भूधर "

कनक-भूधर-शिखर-बासिनी
चंद्रिका-चय-चारु-हासिनि
दशन-कोटि-विकास-बंकिम-
तुलित-चंद्रकले ।।

क्रुद्ध-सुररिपु-बलनिपातिनि
महिष- शुम्भ-निशुम्भघातिनि
भीत-भक्त-भयापनोदन -
पाटव -प्रबले।।

जे देवि दुर्गे दुरिततारिणि
दुर्गामारी - विमर्द -कारिणि
भक्ति - नम्र - सुरासुराधिप -
मंगलप्रवरे ।।

गगन - मंडल - गर्भगाहिनि
समर - भूमिषु - सिंहवाहिनि
परशु - पाश - कृपाण - सायक -
संख -चक्र-धरे ।।

अष्ट - भैरवी - सँग - शालिनी
स्वकर - कृत - कपाल- मालिनि
दनुज - शोणित -पिशित - वर्द्धित-
पारणा-रभसे।।


संसारबन्ध - निदानमोचिनी
चन्द्र - भानु - कृशानु - लोचनि
योगिनी - गण - गीत - शोभित -
नित्यभूमि - रसे ।।

जगति पालन - जन्म - मारण -
रूप - कार्य - सहस्त्र - कारण -
हरी - विरंचि - महेश - शेखर -
चुम्ब्यमान - पड़े। ।

सकल - पापकला - परिच्युति-
सुकवि - विद्यापति - कृतस्तुति
तोषिते - शिवसिंह - भूपति -
कामना - फलदे।। 

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कोकिल विद्यापति देवी की वन्दना करते हुए कहते हैं :

हे सुमेरु पर्वत पर निवास करने वाली , शुभ्र ज्योत्सना की तरह मुस्कान बिखेरनेवाली देवी आप अपने दन्त पंक्तियों के बंकिम विकास से चन्द्रकला को उपमित करती हैं .क्रुद्धावस्था में शत्रुओं के बल का विनाश करनेवाली, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ का संहार करनेवाली हे देवी .....आप भयभीत भक्त के भय को दूर करने में प्रवीन हैं . पाप मुक्त करनेवाली, कठिन शत्रुओं का विनाश करनेवाली तथा भक्ति भाव से विनम्र हुए देवासुरों का कल्याण करनेवाली हे देवी दुर्गे ...आपकी जय हो ! अथाह आकाश मंडल में विचरण करनेवाली सिंह पर सवार हे देवी ! आप समर भूमि में अपने हाथों में परशु, पाश , कृपाण, वाण, शंख आ चक्र धारण किये रहती हैं . आठों भैरवियों को साथ रखनेवाली हे देवी .....आप आनंद प्रदायिनी हैं. चन्द्र, सूर्य और अग्नि के समान नेत्र वाली, संसार के बंधनों के कारणों से छुटकारा दिलानेवाली हे देवी ! संसार की उत्पत्ति पालन और संहार करनेवाली हे देवी आप हज़ारों रूप में कार्यों को सिद्ध करने हेतु हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश का मस्तक लगातार आपके चरणों को स्पर्श करता है . सभी पापों से मुक्ति दिलानेवाली हे देवी कवि विद्यापति आपकी स्तुति करते हैं और राजा शिव सिंह की कामना के अनुरूप फल प्रदान करें .  


Wednesday, December 29, 2010

माँ मैं तो हारी आई शरण तुम्हारी

 

  माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी

माँ मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,
अब जाऊँ किधर तज शरण तुम्हारी 


दर भी तुम्हारा लगे मुझको प्यारा,
 तजूँ मैं कैसे अब शरण तुम्हारी 
माँ......................................


मन मेरा चंचल, धरूँ ध्यान कैसे,
बसो मेरे मन, मैं शरण तुम्हारी
माँ......................................


जीवन की नैया मझधार में है, 
पार उतारो मैं शरण तुम्हारी
माँ................................. 


तन में न शक्ति, करूँ मन भक्ति 
अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी 
माँ.............................................

- कुसुम ठाकुर - 

Tuesday, December 14, 2010

देवी स्तुति (जय जय जगजननि देवी)


"देवी स्तुति"

जय जय जगजननि देवी सुर-नर-मुनि-असुर-सेवी ,
भुक्ति मुक्ति दायिनी, भय-हरण कालिका 

मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वशर्वरीश-वदनि,
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका 

वर्म, चरम कर कृपाण, शूल-शेल-धनुष-बाण,
धरणि, दलनि दानव-दल, रण-करालिका 

पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनि-शाकिनि-समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका 

जय महेश-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक-स्वामिनी, हिमशैल-बालिका

रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु ह्वै प्रसन्न  पाहि प्रणत-पालिका  


Wednesday, September 23, 2009

भगवतीक गीत (जगदम्ब अहिं अवलम्ब)



भगवतीक गीत

जगदम्ब अहिं अवलम्ब हमर
हे माय अहाँ बिनु आस ककर । ....२

जँ माय अहाँ दुःख नय सुनबय,
त जाय कहु ककरा कहबय l
करू माफ़ जननि अपराध हमर ,
हे माय अहाँ बिनु आस ककर
जगदम्ब अहिं .................. ।

हम भरि जग सँ ठुकरायल छी
माँ अहिंक शरण में आयल छी ।
 अछि बिच भंवर में नाव हमर
हे माय अहाँ बिनु आस ककर ।
जगदम्ब अहिं ................... ।

काली लक्ष्मी कल्याणी छी ,
दुर्गे तारा ब्रम्हाणी छी l
अछि पुत्र अहिंक बनल टुगर,
हे माय अहाँ बिनु आस ककर ।
जगदम्ब अहिं ..................... ।




Friday, September 18, 2009

भगवती स्तोत्र (अपराध सहस्राणि)

माँ दुर्गा

अपराध सहस्राणि क्रियन्तेsहर्निशं मया ।
दासोsयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरी ।।

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी ।।

मंत्रहींनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ।।

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत ।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रम्हादयः सुराः ।।

सापराधोsस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।
इदानीमनुकम्प्योsहं यथे च्छसि तथा कुरु ।।

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरी ।।

कामेश्वरी जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ।।

गुह्यातीगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरी ।।

Thursday, September 17, 2009

भगवती गीत (जय भगवती देवी नमो)



जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥

जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥


भावार्थ :
हे वरदायिनी देवि! हे भगवति! तुम्हारी जय हो। हे पापों को नष्ट करने वाली और अनन्त फल देने वाली देवि। तुम्हारी जय हो! हे शुम्भनिशुम्भ के मुण्डों को धारण करने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। हे मुष्यों की पीडा हरने वाली देवि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ॥1॥ हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रों को धारण करने वाली! तुम्हारी जय हो। हे अग्नि के समान देदीप्यामान मुख से शोभित होने वाली! तुम्हारी जय हो। हे भैरव-शरीर में लीन रहने वाली और अन्धकासुरका शोषण करने वाली देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥2॥ हे महिषसुर का मर्दन करने वाली, शूलधारिणी और लोक के समस्त पापों को दूर करने वाली भगवति! तुम्हारी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्र से नमस्कृत होने वाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥3॥ सशस्त्र शङ्कर और कार्तिकेयजी के द्वारा वन्दित होने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। शिव के द्वारा प्रशंसित एवं सागर में मिलने वाली गङ्गारूपिणि देवि! तुम्हारी जय हो। दु:ख और दरिद्रता का नाश तथा पुत्र-कलत्र की वृद्धि करने वाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥4॥ हे देवि! तुम्हारी जय हो। तुम समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्गलोक का दर्शन करानेवाली और दु:खहारिणी हो। हे व्यधिनाशिनी देवि! तुम्हारी जय हो। मोक्ष तुम्हारे करतलगत है, हे मनोवाच्छित फल देने वाली अष्ट सिद्धियों से सम्पन्न परा देवि! तुम्हारी जय हो॥5॥

Thursday, August 13, 2009

कनक भूधर ( भगवती स्तोत्र)


कवि कोकिल विद्यापति


कनक-भूधर-शिखर-बासिनी
चंद्रिका-चय-चारु-हासिनि
दशन-कोटि-विकास-बंकिम-
तुलित-चंद्रकले ।।

क्रुद्ध-सुररिपु-बलनिपातिनि
महिष- शुम्भ-निशुम्भघातिनि
भीत-भक्त-भयापनोदन -
पाटव -प्रबले।।

जे देवि दुर्गे दुरिततारिणि
दुर्गामारी - विमर्द -कारिणि
भक्ति - नम्र - सुरासुराधिप -
मंगलप्रवरे ।।

गगन - मंडल - गर्भगाहिनि
समर - भूमिषु - सिंहवाहिनि
परशु - पाश - कृपाण - सायक -
संख -चक्र-धरे ।।

अष्ट - भैरवी - सँग - शालिनी
स्वकर - कृत - कपाल- मालिनि
दनुज - शोणित -पिशित - वर्द्धित-
पारणा-रभसे।।


संसारबन्ध - निदानमोचिनी
चन्द्र - भानु - कृशानु - लोचनि
योगिनी - गण - गीत - शोभित -
नित्यभूमि - रसे ।।

जगति पालन - जन्म - मारण -
रूप - कार्य - सहस्त्र - कारण -
हरी - विरंचि - महेश - शेखर -
चुम्ब्यमान - पड़े। ।

सकल - पापकला - परिच्युति-
सुकवि - विद्यापति - कृतस्तुति
तोषिते - शिवसिंह - भूपति -
कामना - फलदे।।










 
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