Thursday, February 3, 2011

माधव कत तोर करब बड़ाई.


"कवि कोकिल विद्यापति"

माधव कत तोर करब  बड़ाई
उपमा तोहर कहब ककरा हम, कहितहुं अधिक लजाई 
जओं सिरिखंड सौरभ अति दुर्लभ, तओं पुनि काठ कठोरे 
जओं जगदीस निसाकर, तओं पुनि एकहि पच्छ इजोरे 
मनिक समान आन नहि दोसर, तनिक पाथर नामे 
कनक सरिस एक तोहिं माधव, मन होइछ अनुमाने 
सज्जन जन सओं नेह कठिन थिक, कवि विद्यापति भाने


उपरोक्त पक्तियों में कवि विद्यापति कहते हैं .....हे श्री कृष्ण मैं आपका गुणगान कैसे करूँ, आपकी तुलना किससे करूँ. मुझे तो तुलना करने में भी संकोच हो रहा है . यदि आपकी तुलना दुर्लभ श्री खंड से करता हूँ तो दूसरी तरफ वह कठोर भी तो है. यदि आपकी तुलना दुनिया को रोशनी से उजाला करने वाले चन्द्रमा से करता हूँ तो वह भी तो मात्र एक ही पक्ष के लिए होता है. मणि-माणिक्य से दामी एवम सुन्दर दूसरा कुछ नहीं होता, पर आखिर है तो पत्थर ही. उससे आपकी तुलना कैसे करूँ ? सोना के समान दमकते हुए केला से भी आपकी तुलना नहीं की जा सकती वह भी आपके आगे बहुत छोटा पड़ जाता है. मेरा अनुमान बिल्कुल सही है आपके समान दूसरा कोई नहीं है. कवि विद्यापति कहते हैं सज्जन अर्थात महान व्यक्ति से नेह जोड़ना बहुत ही कठिन है.

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