"अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी"
हरि मैं तो हारी, आई शरण तुम्हारी,
अब जाऊँ किधर तज शरण तुम्हारी।
दर भी तुम्हारा लगे मुझको प्यारा,
तजूँ कैसे अब मैं शरण तुम्हारी।
हरि ..................................
मन मेरा चंचल, धरूँ ध्यान कैसे,
बसो मेरे मन मैं शरण तुम्हारी।
हरि ...................................
जीवन की नैया मझधार में है
पार उतारो मैं शरण तुम्हारी।
हरि ................................
हरि ................................
तन में न शक्ति, करूँ कैसे भक्ति
अब दर्शन दे दो मैं शरण तुम्हारी।
हरि .....................................
- कुसुम ठाकुर -





